Wednesday, May 13, 2009

जीवन कश्ती

ना अंग है...ना रंग है...
ना ढंग है ...ना संग है...
तरंग है..उमंग है॥
एक जंग है ..द्वंद है..द्वंद है...
मन में उठ रहा ये द्वंद है...
ज्वार भुजंग है...
जीवन की कोरी कटी पतंग है ।
छोटी सी कश्ती ,बहुत लम्बी धार है ..
मझधार में फसा, ना कोई पतवार है ।
समुन्दर में तूफ़ान है...पानी चढ़ रहा उफान है...
वर्षा भी शुरू हो गई है..मेघ भी दिल खोल कर हस रही है...
गरज रही है... बरस रही है ।
आहत का अट्टहास वायु भी उठा रहा है...
बड़े वेग के साथ वो कश्ती की और रहा है ..
दयाहीन लहरें कश्ती को उठा उठा कर गिरा रही है ...
उसके अंगो को तार तार करने की प्रचेष्टा की जा रही है...
दिशाहीन दृष्टिहीन , दण्डित पर अखंडित ये कश्ती भंवर में फसती जा रही है...
पर रुकी नही , ये आगे ही चली जा रही है..ये आगे ही चली जा रही है ॥
घोर अंधेरे का आवास है ..
पर दूर कही दिख रहा प्रकाश है ...
वो आस है -
वो आशा का प्रकाश है ...

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