Wednesday, May 13, 2009

उठो, वकत तुम्हारे साथ है ...

ज़िन्दा तो सब रहते हैं इस दुनिया के मेले में ,

चलते तो भीड़ , पर रुकते हैं अकेले में ।

साँसों की लड़ी चलती रहती है ,

धड़कनें क्रमशः बढती रहती है,

लहू नब्ज़ से बहती रहती है,

हम जीते रहते हैं...

हम जीते रहते हैं...

और सिर्फ़ जीते रहते हैं...

बिना जिंदगी जीते हुए ।

हम चलते रहते हैं

बिना मंजिल आँखों में लिए हुए ।।

आभास हमे इस बात का तब होता है

जब अंत समीप होता है ,

अंग निष्क्रिय होते हैं,

मन तुमसे ये पूछता है -

जिंदगी जीने का अवसर तुमने क्यूँ गवाया है ?

मौत का इंतज़ार करते हुए अपना जीवन क्यूँ बिताया है?

उठो जवान , अभी वक़्त तुम्हारे साथ है,

इस कल में विश्राम करना तुम्हारे लिए घोर पाप है ।।

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