ज़िन्दा तो सब रहते हैं इस दुनिया के मेले में ,
चलते तो भीड़ , पर रुकते हैं अकेले में ।
साँसों की लड़ी चलती रहती है ,
धड़कनें क्रमशः बढती रहती है,
लहू नब्ज़ से बहती रहती है,
हम जीते रहते हैं...
हम जीते रहते हैं...
और सिर्फ़ जीते रहते हैं...
बिना जिंदगी जीते हुए ।
हम चलते रहते हैं
बिना मंजिल आँखों में लिए हुए ।।
आभास हमे इस बात का तब होता है
जब अंत समीप होता है ,
अंग निष्क्रिय होते हैं,
मन तुमसे ये पूछता है -
जिंदगी जीने का अवसर तुमने क्यूँ गवाया है ?
मौत का इंतज़ार करते हुए अपना जीवन क्यूँ बिताया है?
उठो जवान , अभी वक़्त तुम्हारे साथ है,
इस कल में विश्राम करना तुम्हारे लिए घोर पाप है ।।

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