ऐ ज़िंदगी, रुक जा , ज़रा तो ठहर ।
मुड़ कर तो देख,
जो बीत गया पहर ।
चल-चला है तू जिस डगर ,
अंजाम का किया न तुने जो फिकर ...
ये ज़िंदगी का सफर,
क्या पाया तूने, क्या खोया ....
इसका हिसाब तू कर इस कदर-
की जो बचा है उसे उमंग-रुपेण मन में भर,
की ये कदम, जो चले है नभ को छूने उसके घर,
ये बाज़ूएं जिन्हें सहना है जीवन का हर कहर,
और होना है सफल ,
बढ़ते रहे ! यादें बोझ न बनें !
ना बन अवरोध यादें बने हमारा बल !
यादें बनकर दीपक करे जीवन पथ रौशन !
यादें बनकर उम्मीद रहे मन में हर दम !
यादें हममें रहे जब तक रहे हम !!

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